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सेना की जान ज़रूरी है! | पुलवामा अटैक पर कविता | Hindi Poem on Patriotism

सेना की जान जरूरी है,

या जबरन का मानवाधिकार जरूरी है?

जब बात देश की गरिमा की हो,

तो क्या अभिव्यक्ति का अधिकार जरूरी है?

बात बहुत हुई बरसों-तरसों,

अब एक लात जरूरी है।।

छोड़ो करना चर्चा टेबल पर,

सर्जिकल स्ट्राइक दो-चार जरूरी है।।

जब तक ख़तम हों ना जाएं ये कीड़े,

गोली की बौछार जरूरी है।।

बुजदिल हमला करते छिप-छिप कर हम पर,

अब कुनबे मेें भी उनके हाहाकार जरुरी है।।

चोटिल होती माँ की ममता घायल आँचल जिनसे है,

सीना ताने वो चलते हैं, अब उनकी हार जरुरी है ।।

बेसुध बैठी है जनता हम खुद ही खुद मेें उलझे है,

जो सुलगे ना हम इन बलिदानों पर तो खुद पे धिक्कार जरुरी है।।

काटे घर में बैठे दुश्मन एक ऐसी तलवार जरुरी है,

सेना की जान ज़रूरी है… सेना की जान ज़रूरी है…


माँ Hindi Poem on Mother Maa Par Kavita

कब्र के आगोश में जब थक के सो जाती है माँ,
तब कहीं जाकर थोड़ा सुकून पाती है माँ,
फिक्र में बच्चों के कुछ ऐसे ही घुल जाती है माँ,
नौजवा होते हुए बूढ़ी नज़र आती है माँ,
कब ज़रूरत हो मेरे बच्चे को इतना सोच कर,
जागती रहती है आँखें और सो जाती है माँ,
रूह के रिश्तों की ये गहराईयाँ तो देखिये,
चोट लगती है हमे और चिल्लाती है माँ,
लौट कर वापस सफर से जब भी घर आती है माँ,
डाल कर बाहें गले में सर को सहलाती है माँ,
शुक्रिया हो नही सकता कभी उसका अदा,
मरते मरते भी दुआ जीने की दे जाती है माँ,
मरते दम बच्चा अगर आ पाये ना परदेस से,
अपनी दोनों पुतलियाँ चौखट पे रख जाती है माँ,
प्यार कहते है किसे और ममता क्या चीज है,
ये तो उन बच्चों से पूछो,के जिनकी मर जाती है माँ।


ये मत सोचो कि... Motivational Poem in Hindi | प्रेरणादायक हिंदी कविता

ये मत सोचो कि तुम्हारे पास क्या नहीं है;

बल्कि, उसे सराहो जो तुम्हारे पास है और जो हो सकता है।

ये सोच कर दुखी मत हो कि तुम क्या नहीं हो;

बल्कि, ये सोच कर खुश हो कि तुम क्या हो और क्या बन सकते हो।

ये मत सोचो कि लोग तुम्हारे बारे में क्या कहते हैं;

बल्कि, ये सोचो कि तुम खुद अपने बारे में क्या सोचते हो और क्या सोच सकते हो।

ये मत सोचो कि कितना समय बीत गया;

बल्कि, ये सोचो कि कितना समय बाकी है और कितना मिल सकता है।

ये मत सोचो कि तुम फेल हो गए;

बल्कि, ये सोचो कि तुमने क्या सीखा और तुम क्या कर सकते हो।

ये मत सोचो कि तुमने क्या गलतियाँ कीं;

बल्कि, ये सोचो कि तुमने क्या सही किया और क्या सही कर सकते हो।   

ये मत सोचो कि आज कितनी तकलीफ उठानी पड़ रही है;

बल्कि ये सोचो कि कल कितना शानदार होगा और हो सकता है।

ये मत सोचो कि क्या हो सकता था;

बल्कि, ये सोचो कि क्या है और क्या हो सकता है।

ये मत सोचो कि कप कितना खाली है;

बल्कि, ये सोचो कि कप कितना भरा है और कितना भरा जा सकता है।

ये मत सोचो कि तुमने क्या खोया;

बल्कि, ये सोचो कि तुमने क्या पाया और क्या पा सकते हो।


बचपन | Children's Day Poem in Hindi

पक्की सड़कें, ऊंचे घर हैं चारो ओर मगर, बचपन की वो कच्ची गलियां भूल नहीं सकता।

मंहगी-मंहगी मोटर हैं, कारें हैं चारों ओर, पर वो घंटी वाली लाल साइकिल भूल नहीं सकता।

झूले वाले आ जाते हैं अक्सर यहां मगर, जाने क्यों वो पेड़ की डाली भूल नहीं सकता।

चाकलेट और टाफी के डिब्बे घर में रखे हैं फिर भी खट्टा मिट्ठा चूरन अपना भूल नहीं सकता।

मोबाइल ने बना दिया है सब कुछ बड़ा सरल, पर जाने क्यूं वो पोस्टकार्ड निराला भूल नहीं सकता।

सौ – सौ चैनल टीवी पर आते हैं रातो दिन, पर बुद्धवार का चित्रहार मै भूल नहीं सकता।

कम्प्यूटर पर गेम खेलना अच्छा लगता है, पर पोसम पा और इक्खल दुक्खन भूल नहीं सकता।

चाइना की पिचकारी ने मचा रखी है धूम बहुत, पर होली वाला कींचड़ फिर भी भूल नहीं सकता।

मोबाइल की घण्टी से खुल जाती है नींद मगर, चिड़ियों की वो चूं चूं चैं चैं भूल नहीं सकता।

बिग बाज़ार से लेकर आते मंहगे – मंहगे फल, पर बगिया की वो कच्ची अमिया भूल नहीं सकता।

सुपरमैन और हल्क की फिल्में अच्छी तो लगती हैं पर, चाचा चैधरी, बिल्लू, पिंकी भूल नहीं सकता।

बड़े ब्रैण्ड के जूते चप्पल चलते सालों साल मगर, सिली हुई वो टूटी चप्पल भूल नहीं सकता।

बनते हैं हर रोज़ यहां दोस्त नये अक्सर, पर बचपन की वो टोली अपनी भूल नहीं सकता।

बारिश में अब पापकार्न घर में ही मिलता है, पर भरभूजे की सोंधी लइया भूल नहीं सकता।

दोस्तों के संग वाटर पार्क जाता हूं मै अक्सर, पर गुड़िया के दिन की बड़ी नहरिया भूल नहीं सकता।

सोफे पर बैठे – बैठे जाने क्यूं लगता है मुझको, आंगन की वो टूटी खटिया भूल नहीं सकता।

पढ़ लिख कर मै आज सयाना क्यूं न बन जाऊं मगर, ट्यूशन वाले मास्टर जी को भूल नहीं सकता।

अब जेब में रहते पैसे हर दम, पर  मां – पापा की दी हुई अठन्नी भूल नहीं सकता।

 कुछ भी हो जाये जीवन में पर इतना निष्चित है मित्रों, मरते दम तक अपना बचपन भूल नहीं सकता।


न मैं हूं महान... न तुम हो महान Hindi Poem on Importance of Teamwork

छिड़ी हुई है हाथ की उंगलियों में लड़ाई

चारों कर रही हैं, अपनी महत्वता की अगुवाई

मध्यमा बोली, मैं हूं महान

कद में हूं ऊंची, तुम करो सम्मान

हो तुम मेरे, पहरेदार

मेरी रक्षा, तुम्हारा है काम

कनिष्ठा बोली, ज़रा करो नमस्कार

मेरे पीछे, दिखते हो तुम चार..

कद में चाहे, मैं छोटी हूं,

लेकिन, प्रथम मैं आती हूं।

कनिष्ठा पर हंसती, अनामिका

बोली मैं हूं, सौन्दर्य की मलिका

मुझपे चढ़ता अंगुठी का ताज

रिश्तों को मिलता, मुझसे नाम।

नाम के तर्क पर, तर्जनी बोली

मुझसे उपयोगी, तुम में से कोई नहीं

मैं दर्शाती, मैं दिखाती, आदेश देना, है मेरा काम

इसीलिए मैं हूं, सब में महान

चुपचाप अलग किनारे बैठा

आया अंगुठा, किया सवाल

क्या कभी है, तुम सबने सोचा

मेरे बिना, क्या कोई काम होता

न उठा पाते, कोई सामान

न नल बंद करना होता, इतना आसान

खिसिया के अंगुठे से बोली उंगलियां…

क्या तुम्हें लगता है तुम हो महान

अंगुठा बोला…

न मैं हूं महान… न तुम हो महान

हमारा साथ ही है, हमारा अभिमान

जो न होता हम में से कोई पांच

तो नहीं बन पाता, सुंदर हाथ।


Poem on Teachers in Hindi / गुरु पर कविता

गुरु की उर्जा सूर्य-सी, अम्बर-सा विस्तार.
गुरु की गरिमा से बड़ा, नहीं कहीं आकार.

गुरु का सद्सान्निध्य ही,जग में हैं उपहार.
प्रस्तर को क्षण-क्षण गढ़े, मूरत हो तैयार.

गुरु वशिष्ठ होते नहीं, और न विश्वामित्र.
तुम्हीं बताओ राम का, होता प्रखर चरित्र?

गुरुवर पर श्रद्धा रखें, हृदय रखें विश्वास.
निर्मल होगी बुद्धि तब, जैसे रुई- कपास.

गुरु की करके वंदना, बदल भाग्य के लेख.
बिना आँख के सूर ने, कृष्ण लिए थे देख.

गुरु से गुरुता ग्रहणकर, लघुता रख भरपूर.
लघुता से प्रभुता मिले, प्रभुता से प्रभु दूर.

गुरु ब्रह्मा-गुरु विष्णु है, गुरु ही मान महेश.
गुरु से अन्तर-पट खुलें, गुरु ही हैं परमेश.

गुरु की कर आराधना, अहंकार को त्याग.
गुरु ने बदले जगत में, कितने ही हतभाग.

गुरु की पारस दृष्टि से , लोह बदलता रूप.
स्वर्ण कांति-सी बुद्धि हो,ऐसी शक्ति अनूप.

गुरु ने ही लव-कुश गढ़े , बने प्रतापी वीर.
अश्व रोक कर राम का, चला दिए थे तीर.

गुरु ने साधे जगत के, साधन सभी असाध्य.
गुरु-पूजन, गुरु-वंदना, गुरु ही है आराध्य.

गुरु से नाता शिष्य का, श्रद्धा भाव अनन्य.
शिष्य सीखकर धन्य हो, गुरु भी होते धन्य.

गुरु के अंदर ज्ञान का, कल-कल करे निनाद.
जिसने अवगाहन किया, उसे मिला मधु-स्वाद.

गुरु के जीवन मूल्य ही, जग में दें संतोष.
अहम मिटा दें बुद्धि के, मिटें लोभ के दोष.

गुरु चरणों की वंदना, दे आनन्द अपार.
गुरु की पदरज तार दे, खुलें मुक्ति के द्वार.

गुरु की दैविक दृष्टि ने, हरे जगत के क्लेश.
पुण्य -कर्म- सद्कर्म से, बदल दिए परिवेश.

गुरु से लेकर प्रेरणा, मन में रख विश्वास.
अविचल श्रद्धा भक्ति ने, बदले हैं इतिहास.

गुरु में अन्तर ज्ञान का, धक-धक करे प्रकाश.
ज्ञान-ज्योति जाग्रत करे, करे पाप का नाश.

गुरु ही सींचे बुद्धि को, उत्तम करे विचार.
जिससे जीवन शिष्य का, बने स्वयं उपहार.

गुरु गुरुता को बाँटते, कर लघुता का नाश.
गुरु की भक्ति-युक्ति ही, काट रही भवपाश.


"माँ" - मदर्स डे पर कविता Mother's Day Poem in Hindi

कोई अौर झुलाता है झूले मैं तो भी रो जाता हूँ,

मैं तो बस अपनी माँ की थपकी पाकर ही सो पाता हूँ।

कुछ ऐसा रिश्ता है मेरा मेरी माँ से

दर्द वो ले लेती है सारे और मैं बस मुस्कुराता हूँ।

यूँ तो जमाने के नजरों मैं मैं बड़ा हो गया हूँ,

पर दूर जब माँ से होता हूँ तो रो जाता हूँ।

चारदिवारी से घिरा वो कमरा बिन तेरे घर नहीं लगता माँ,

मैं हर रोज अपने ही कमरें मैं मेहमान हो जाता हूँ।

जब भी ज़माना मुझे कमजोर करने की कोशिश करता है,

याद करके तुझे माँ मजबूत बन जाता हूँ।

जब सोचता हूँ कुर्बानियां तेरी माँ

आंसुओं के समंदर में खो जाता हूँ।

मैं रात-रात भर जागता ही रहता हूँ माँ,

अब तेरे आँचल में छुप कर कहाँ सो पाता हूँ।


Poem on Teachers in Hindi / गुरु पर कविता

गुरु की उर्जा सूर्य-सी, अम्बर-सा विस्तार.
गुरु की गरिमा से बड़ा, नहीं कहीं आकार.

गुरु का सद्सान्निध्य ही,जग में हैं उपहार.
प्रस्तर को क्षण-क्षण गढ़े, मूरत हो तैयार.

गुरु वशिष्ठ होते नहीं, और न विश्वामित्र.
तुम्हीं बताओ राम का, होता प्रखर चरित्र?

गुरुवर पर श्रद्धा रखें, हृदय रखें विश्वास.
निर्मल होगी बुद्धि तब, जैसे रुई- कपास.

गुरु की करके वंदना, बदल भाग्य के लेख.
बिना आँख के सूर ने, कृष्ण लिए थे देख.

गुरु से गुरुता ग्रहणकर, लघुता रख भरपूर.
लघुता से प्रभुता मिले, प्रभुता से प्रभु दूर.

गुरु ब्रह्मा-गुरु विष्णु है, गुरु ही मान महेश.
गुरु से अन्तर-पट खुलें, गुरु ही हैं परमेश.

गुरु की कर आराधना, अहंकार को त्याग.
गुरु ने बदले जगत में, कितने ही हतभाग.

गुरु की पारस दृष्टि से , लोह बदलता रूप.
स्वर्ण कांति-सी बुद्धि हो,ऐसी शक्ति अनूप.

गुरु ने ही लव-कुश गढ़े , बने प्रतापी वीर.
अश्व रोक कर राम का, चला दिए थे तीर.

गुरु ने साधे जगत के, साधन सभी असाध्य.
गुरु-पूजन, गुरु-वंदना, गुरु ही है आराध्य.

गुरु से नाता शिष्य का, श्रद्धा भाव अनन्य.
शिष्य सीखकर धन्य हो, गुरु भी होते धन्य.

गुरु के अंदर ज्ञान का, कल-कल करे निनाद.
जिसने अवगाहन किया, उसे मिला मधु-स्वाद.

गुरु के जीवन मूल्य ही, जग में दें संतोष.
अहम मिटा दें बुद्धि के, मिटें लोभ के दोष.

गुरु चरणों की वंदना, दे आनन्द अपार.
गुरु की पदरज तार दे, खुलें मुक्ति के द्वार.

गुरु की दैविक दृष्टि ने, हरे जगत के क्लेश.
पुण्य -कर्म- सद्कर्म से, बदल दिए परिवेश.

गुरु से लेकर प्रेरणा, मन में रख विश्वास.
अविचल श्रद्धा भक्ति ने, बदले हैं इतिहास.

गुरु में अन्तर ज्ञान का, धक-धक करे प्रकाश.
ज्ञान-ज्योति जाग्रत करे, करे पाप का नाश.

गुरु ही सींचे बुद्धि को, उत्तम करे विचार.
जिससे जीवन शिष्य का, बने स्वयं उपहार.

गुरु गुरुता को बाँटते, कर लघुता का नाश.
गुरु की भक्ति-युक्ति ही, काट रही भवपाश.


माँ Hindi Poem on Mother Maa Par Kavita

कब्र के आगोश में जब थक के सो जाती है माँ,
तब कहीं जाकर थोड़ा सुकून पाती है माँ,
फिक्र में बच्चों के कुछ ऐसे ही घुल जाती है माँ,
नौजवा होते हुए बूढ़ी नज़र आती है माँ,
कब ज़रूरत हो मेरे बच्चे को इतना सोच कर,
जागती रहती है आँखें और सो जाती है माँ,
रूह के रिश्तों की ये गहराईयाँ तो देखिये,
चोट लगती है हमे और चिल्लाती है माँ,
लौट कर वापस सफर से जब भी घर आती है माँ,
डाल कर बाहें गले में सर को सहलाती है माँ,
शुक्रिया हो नही सकता कभी उसका अदा,
मरते मरते भी दुआ जीने की दे जाती है माँ,
मरते दम बच्चा अगर आ पाये ना परदेस से,
अपनी दोनों पुतलियाँ चौखट पे रख जाती है माँ,
प्यार कहते है किसे और ममता क्या चीज है,
ये तो उन बच्चों से पूछो,के जिनकी मर जाती है माँ।


सेना की जान ज़रूरी है! | पुलवामा अटैक पर कविता | Hindi Poem on Patriotism

सेना की जान जरूरी है,

या जबरन का मानवाधिकार जरूरी है?

जब बात देश की गरिमा की हो,

तो क्या अभिव्यक्ति का अधिकार जरूरी है?

बात बहुत हुई बरसों-तरसों,

अब एक लात जरूरी है।।

छोड़ो करना चर्चा टेबल पर,

सर्जिकल स्ट्राइक दो-चार जरूरी है।।

जब तक ख़तम हों ना जाएं ये कीड़े,

गोली की बौछार जरूरी है।।

बुजदिल हमला करते छिप-छिप कर हम पर,

अब कुनबे मेें भी उनके हाहाकार जरुरी है।।

चोटिल होती माँ की ममता घायल आँचल जिनसे है,

सीना ताने वो चलते हैं, अब उनकी हार जरुरी है ।।

बेसुध बैठी है जनता हम खुद ही खुद मेें उलझे है,

जो सुलगे ना हम इन बलिदानों पर तो खुद पे धिक्कार जरुरी है।।

काटे घर में बैठे दुश्मन एक ऐसी तलवार जरुरी है,

सेना की जान ज़रूरी है… सेना की जान ज़रूरी है…


ये मत सोचो कि... Motivational Poem in Hindi | प्रेरणादायक हिंदी कविता

ये मत सोचो कि तुम्हारे पास क्या नहीं है;

बल्कि, उसे सराहो जो तुम्हारे पास है और जो हो सकता है।

ये सोच कर दुखी मत हो कि तुम क्या नहीं हो;

बल्कि, ये सोच कर खुश हो कि तुम क्या हो और क्या बन सकते हो।

ये मत सोचो कि लोग तुम्हारे बारे में क्या कहते हैं;

बल्कि, ये सोचो कि तुम खुद अपने बारे में क्या सोचते हो और क्या सोच सकते हो।

ये मत सोचो कि कितना समय बीत गया;

बल्कि, ये सोचो कि कितना समय बाकी है और कितना मिल सकता है।

ये मत सोचो कि तुम फेल हो गए;

बल्कि, ये सोचो कि तुमने क्या सीखा और तुम क्या कर सकते हो।

ये मत सोचो कि तुमने क्या गलतियाँ कीं;

बल्कि, ये सोचो कि तुमने क्या सही किया और क्या सही कर सकते हो।   

ये मत सोचो कि आज कितनी तकलीफ उठानी पड़ रही है;

बल्कि ये सोचो कि कल कितना शानदार होगा और हो सकता है।

ये मत सोचो कि क्या हो सकता था;

बल्कि, ये सोचो कि क्या है और क्या हो सकता है।

ये मत सोचो कि कप कितना खाली है;

बल्कि, ये सोचो कि कप कितना भरा है और कितना भरा जा सकता है।

ये मत सोचो कि तुमने क्या खोया;

बल्कि, ये सोचो कि तुमने क्या पाया और क्या पा सकते हो।


बचपन | Children's Day Poem in Hindi

पक्की सड़कें, ऊंचे घर हैं चारो ओर मगर, बचपन की वो कच्ची गलियां भूल नहीं सकता।

मंहगी-मंहगी मोटर हैं, कारें हैं चारों ओर, पर वो घंटी वाली लाल साइकिल भूल नहीं सकता।

झूले वाले आ जाते हैं अक्सर यहां मगर, जाने क्यों वो पेड़ की डाली भूल नहीं सकता।

चाकलेट और टाफी के डिब्बे घर में रखे हैं फिर भी खट्टा मिट्ठा चूरन अपना भूल नहीं सकता।

मोबाइल ने बना दिया है सब कुछ बड़ा सरल, पर जाने क्यूं वो पोस्टकार्ड निराला भूल नहीं सकता।

सौ – सौ चैनल टीवी पर आते हैं रातो दिन, पर बुद्धवार का चित्रहार मै भूल नहीं सकता।

कम्प्यूटर पर गेम खेलना अच्छा लगता है, पर पोसम पा और इक्खल दुक्खन भूल नहीं सकता।

चाइना की पिचकारी ने मचा रखी है धूम बहुत, पर होली वाला कींचड़ फिर भी भूल नहीं सकता।

मोबाइल की घण्टी से खुल जाती है नींद मगर, चिड़ियों की वो चूं चूं चैं चैं भूल नहीं सकता।

बिग बाज़ार से लेकर आते मंहगे – मंहगे फल, पर बगिया की वो कच्ची अमिया भूल नहीं सकता।

सुपरमैन और हल्क की फिल्में अच्छी तो लगती हैं पर, चाचा चैधरी, बिल्लू, पिंकी भूल नहीं सकता।

बड़े ब्रैण्ड के जूते चप्पल चलते सालों साल मगर, सिली हुई वो टूटी चप्पल भूल नहीं सकता।

बनते हैं हर रोज़ यहां दोस्त नये अक्सर, पर बचपन की वो टोली अपनी भूल नहीं सकता।

बारिश में अब पापकार्न घर में ही मिलता है, पर भरभूजे की सोंधी लइया भूल नहीं सकता।

दोस्तों के संग वाटर पार्क जाता हूं मै अक्सर, पर गुड़िया के दिन की बड़ी नहरिया भूल नहीं सकता।

सोफे पर बैठे – बैठे जाने क्यूं लगता है मुझको, आंगन की वो टूटी खटिया भूल नहीं सकता।

पढ़ लिख कर मै आज सयाना क्यूं न बन जाऊं मगर, ट्यूशन वाले मास्टर जी को भूल नहीं सकता।

अब जेब में रहते पैसे हर दम, पर  मां – पापा की दी हुई अठन्नी भूल नहीं सकता।

 कुछ भी हो जाये जीवन में पर इतना निष्चित है मित्रों, मरते दम तक अपना बचपन भूल नहीं सकता।


मेरी मां जादू जानती है…

मां फल-सब्जी जब काटती है,
उंगली पर उस को बांटती है,
चाकू की धार हो तेज़ मगर,
न फ़िक्र उसे, न कोई डर
वह धार के रुख़ पहचानती है।।
मेरी मां जादू जानती है…!

ग़म, गुस्सा हो या बीमारी हो,
जैसी भी कोई दुश्वारी हो,
लेकिन वह ज़रा ना घबराए,
हर मसला पल में सुलझाए,
करती है वही, जो ठानती है।।
मेरी मां जादू जानती है…!

करती है काम वह खड़ी-खड़ी,
जैसे हो उसे जादू की छड़ी,
आखिर वह क्यों थकती ही नहीं,
कल की राहें तकती ही नहीं,
वह आज की बात को मानती है।।
मेरी मां जादू जानती है…!

बस एक ही आंचल है उसको,
वह काम बहुत उससे लेती,
कभी साफ करे, बर्तन पकड़े,
कुछ बांध के गांठ लगा लेती,
कभी पानी,दूध को छानती है।।
मेरी मां जादू जानती है…!


मेरी मां जादू जानती है…

मां फल-सब्जी जब काटती है,
उंगली पर उस को बांटती है,
चाकू की धार हो तेज़ मगर,
न फ़िक्र उसे, न कोई डर
वह धार के रुख़ पहचानती है।।
मेरी मां जादू जानती है…!

ग़म, गुस्सा हो या बीमारी हो,
जैसी भी कोई दुश्वारी हो,
लेकिन वह ज़रा ना घबराए,
हर मसला पल में सुलझाए,
करती है वही, जो ठानती है।।
मेरी मां जादू जानती है…!

करती है काम वह खड़ी-खड़ी,
जैसे हो उसे जादू की छड़ी,
आखिर वह क्यों थकती ही नहीं,
कल की राहें तकती ही नहीं,
वह आज की बात को मानती है।।
मेरी मां जादू जानती है…!

बस एक ही आंचल है उसको,
वह काम बहुत उससे लेती,
कभी साफ करे, बर्तन पकड़े,
कुछ बांध के गांठ लगा लेती,
कभी पानी,दूध को छानती है।।
मेरी मां जादू जानती है…!


my villege

तेरी बुराइयों को हर अखबार कहता है..
और तू मेरे गाँव को गँवार कहता है….

ऐ शहर मुझे तेरी औकात पता है,
तू चुल्लू भर पानी को वाटर पार्क कहता है…

थक गया है हर शख्स काम करते करते,
तू इसे अमीरी का बाजार कहता है…

गाँव चलो वक्त ही वक्त है सबके पास,
तेरी सारी फुर्सत तेरा इतवार कहता है…

मौन होकर फोन पर रिश्ते निभाए जा रहा है,
तू इस मशीनी दौर को परिवार कहता है…

जिनकी सेवा में बिता देते सारा जीवन,
तू उन माँ-बाप को खुद पर बोझ कहता है…

वो मिलने आते थे तो कलेजा साथ लाते थे,
तू दस्तूर निभाने को रिश्तेदार कहता है…

बड़े बड़े मसले हल करती यहां पंचायतें,
तू अँधी भष्ट दलीलों को दरबार कहता है…

बैठ जाते हैं अपने पराये साथ बैलगाड़ी में,
पूरा परिवार भी ना बैठ पाये उसे तू कार कहता है…

अब बच्चे भी बडों का आदर भूल बैठे हैं,
तू इस नये दौर को संस्कार कहता है…

जिंदा है आज भी गाँव में देश की संस्कृति,
तू भूल के अपनी सभ्यता खुद को तू शहर कहता है…!!

कवि ने अपनी इस कविता में एक-एक शब्द को गहरी भावनाओं के साथ पिरोया है| जिस प्रकार हर तरफ अब शहरीकरण बढ़ता जा रहा है वैसे-वैसे ही लोगों का मानसिक स्तर भी नीचे गिरता जा रहा है|

अब संस्कारों की बात कौन करता है, साहब हर इंसान अब सिर्फ पैसों की बात करता है|

माँ बाप अपने बच्चों के लिए अपने सारे सुख कुर्बान कर देते हैं और बच्चे बड़े होकर शहर पैसा कमाने चल देते हैं|

बूढी आँखें थक-थककर अपने बच्चों की राह तकती हैं लेकिन पैसे की चकाचौंध इंसान को अँधा कर देती है| कहने को शहर अमीर है लेकिन यहाँ सिर्फ पैसे के अमीर लोग रहते हैं, दिल का अमीर तो कोई कोई ही मिलता है|

परिवार, रिश्ते नाते अब सब बस एक बंधन बनकर रह गए हैं,
आत्मीयता और प्यार तो उनमें रहा ही नहीं,
जो माँ बाप अपना खून पसीना एक करके पढ़ाते हैं
उनको बोलते हैं कि आपने हमारे लिए कुछ किया ही नहीं|

इससे तो अपना गाँव अच्छा है कम से कम लोगों के दिल में एक दूसरे के लिए प्यार तो है, परेशानियों में एक दूसरे का साथ तो है, पैसा चाहे कम हो लेकिन संस्कार और दुलार तो है|

ये कविता आपको कैसी लगी दोस्तों आप ये हमको कमेंट करके जरूर बताइये| इस कविता ने अगर आपका दिल छुआ हो तो इसे शेयर भी जरूर करें और हिंदीसोच से आगे भी ऐसे जी जुड़े रहिये धन्यवाद!!


my villege

तेरी बुराइयों को हर अखबार कहता है..
और तू मेरे गाँव को गँवार कहता है….

ऐ शहर मुझे तेरी औकात पता है,
तू चुल्लू भर पानी को वाटर पार्क कहता है…

थक गया है हर शख्स काम करते करते,
तू इसे अमीरी का बाजार कहता है…

गाँव चलो वक्त ही वक्त है सबके पास,
तेरी सारी फुर्सत तेरा इतवार कहता है…

मौन होकर फोन पर रिश्ते निभाए जा रहा है,
तू इस मशीनी दौर को परिवार कहता है…

जिनकी सेवा में बिता देते सारा जीवन,
तू उन माँ-बाप को खुद पर बोझ कहता है…

वो मिलने आते थे तो कलेजा साथ लाते थे,
तू दस्तूर निभाने को रिश्तेदार कहता है…

बड़े बड़े मसले हल करती यहां पंचायतें,
तू अँधी भष्ट दलीलों को दरबार कहता है…

बैठ जाते हैं अपने पराये साथ बैलगाड़ी में,
पूरा परिवार भी ना बैठ पाये उसे तू कार कहता है…

अब बच्चे भी बडों का आदर भूल बैठे हैं,
तू इस नये दौर को संस्कार कहता है…

जिंदा है आज भी गाँव में देश की संस्कृति,
तू भूल के अपनी सभ्यता खुद को तू शहर कहता है…!!

कवि ने अपनी इस कविता में एक-एक शब्द को गहरी भावनाओं के साथ पिरोया है| जिस प्रकार हर तरफ अब शहरीकरण बढ़ता जा रहा है वैसे-वैसे ही लोगों का मानसिक स्तर भी नीचे गिरता जा रहा है|

अब संस्कारों की बात कौन करता है, साहब हर इंसान अब सिर्फ पैसों की बात करता है|

माँ बाप अपने बच्चों के लिए अपने सारे सुख कुर्बान कर देते हैं और बच्चे बड़े होकर शहर पैसा कमाने चल देते हैं|

बूढी आँखें थक-थककर अपने बच्चों की राह तकती हैं लेकिन पैसे की चकाचौंध इंसान को अँधा कर देती है| कहने को शहर अमीर है लेकिन यहाँ सिर्फ पैसे के अमीर लोग रहते हैं, दिल का अमीर तो कोई कोई ही मिलता है|

परिवार, रिश्ते नाते अब सब बस एक बंधन बनकर रह गए हैं,
आत्मीयता और प्यार तो उनमें रहा ही नहीं,
जो माँ बाप अपना खून पसीना एक करके पढ़ाते हैं
उनको बोलते हैं कि आपने हमारे लिए कुछ किया ही नहीं|

इससे तो अपना गाँव अच्छा है कम से कम लोगों के दिल में एक दूसरे के लिए प्यार तो है, परेशानियों में एक दूसरे का साथ तो है, पैसा चाहे कम हो लेकिन संस्कार और दुलार तो है|

ये कविता आपको कैसी लगी दोस्तों आप ये हमको कमेंट करके जरूर बताइये| इस कविता ने अगर आपका दिल छुआ हो तो इसे शेयर भी जरूर करें और हिंदीसोच से आगे भी ऐसे जी जुड़े रहिये धन्यवाद!!


न मैं हूं महान... न तुम हो महान Hindi Poem on Importance of Teamwork

छिड़ी हुई है हाथ की उंगलियों में लड़ाई

चारों कर रही हैं, अपनी महत्वता की अगुवाई

मध्यमा बोली, मैं हूं महान

कद में हूं ऊंची, तुम करो सम्मान

हो तुम मेरे, पहरेदार

मेरी रक्षा, तुम्हारा है काम

कनिष्ठा बोली, ज़रा करो नमस्कार

मेरे पीछे, दिखते हो तुम चार..

कद में चाहे, मैं छोटी हूं,

लेकिन, प्रथम मैं आती हूं।

कनिष्ठा पर हंसती, अनामिका

बोली मैं हूं, सौन्दर्य की मलिका

मुझपे चढ़ता अंगुठी का ताज

रिश्तों को मिलता, मुझसे नाम।

नाम के तर्क पर, तर्जनी बोली

मुझसे उपयोगी, तुम में से कोई नहीं

मैं दर्शाती, मैं दिखाती, आदेश देना, है मेरा काम

इसीलिए मैं हूं, सब में महान

चुपचाप अलग किनारे बैठा

आया अंगुठा, किया सवाल

क्या कभी है, तुम सबने सोचा

मेरे बिना, क्या कोई काम होता

न उठा पाते, कोई सामान

न नल बंद करना होता, इतना आसान

खिसिया के अंगुठे से बोली उंगलियां…

क्या तुम्हें लगता है तुम हो महान

अंगुठा बोला…

न मैं हूं महान… न तुम हो महान

हमारा साथ ही है, हमारा अभिमान

जो न होता हम में से कोई पांच

तो नहीं बन पाता, सुंदर हाथ।


"माँ" - मदर्स डे पर कविता Mother's Day Poem in Hindi

कोई अौर झुलाता है झूले मैं तो भी रो जाता हूँ,

मैं तो बस अपनी माँ की थपकी पाकर ही सो पाता हूँ।

कुछ ऐसा रिश्ता है मेरा मेरी माँ से

दर्द वो ले लेती है सारे और मैं बस मुस्कुराता हूँ।

यूँ तो जमाने के नजरों मैं मैं बड़ा हो गया हूँ,

पर दूर जब माँ से होता हूँ तो रो जाता हूँ।

चारदिवारी से घिरा वो कमरा बिन तेरे घर नहीं लगता माँ,

मैं हर रोज अपने ही कमरें मैं मेहमान हो जाता हूँ।

जब भी ज़माना मुझे कमजोर करने की कोशिश करता है,

याद करके तुझे माँ मजबूत बन जाता हूँ।

जब सोचता हूँ कुर्बानियां तेरी माँ

आंसुओं के समंदर में खो जाता हूँ।

मैं रात-रात भर जागता ही रहता हूँ माँ,

अब तेरे आँचल में छुप कर कहाँ सो पाता हूँ।