Posted by Raja Kumar , Posted 132 days ago

भारतीय राजनीतिक चिंतनधारा के विभिन्न स्त्रोतों की व्याख्या करें

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Answer By : Raja Kumar


भारतीय राजनीतिक चिंतन की परम्परा बहुत पुरानी है | यह परम्परा पश्चिमी राजनीतिक चिंतन के प्रारंभ से भी अधिक पुरानी है | भारतीय राजनीतिक चिंतन की परंपरा वैदिक युग से प्रारंभ हुई और वहीँ 14वीं शताब्दी में मुस्लिम शासन की स्थापना तक चलती रही | बाद में विदेशी आक्रमण होने पर नए धार्मिक आंदोलन, नयी जातियों, श्रेणियों एवं संघों के जन्म लेने पर समस्याओं के उद्देश्य से भारतीय चिंतन में नए-नए विचारों ने जन्म लिया
| भारतीय समस्याओं के समाधान के अध्ययन के निम्नलिखित स्त्रोत है-
(1) भारतीय साहित्य   (2) विदेशी स्त्रोत  (3) पुरातत्त्व सामग्री |

भारतीय साहित्य--प्राचीन भारतीय साहित्य के अंतर्गत वैदिक साहित्य, ब्राह्मण साहित्य, उपनिषद, महाकाव्य, पुराण, स्मिर्तियों, बौद्ध व् जैन साहित्य, कौटिल्य का अर्थशास्त्र, नीति शास्त्र आदि है |

(क) वैदिक शास्त्र--हिन्दू राज्यशास्त्र के प्राचीनतम ग्रन्थ 4 वेद है-ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद व अर्थवेद | इन वेदों में राज्य व शासन की उत्पत्ति, राजतंत्र की व्यवस्था, राजा का अधिकार व कर्तव्य, मंत्रिपरिषद का संगठन व उनके कार्य तथा शासन की नीति आदि का व्यापक वर्णन मिलता है | ऋग्वेद में विशेष रूप से आर्यों का प्रसार व उनके द्वारा स्थापित राज्य व्यवस्था व द्रविड़ों से संघर्ष आदि का उल्लेख मिलता है
|

(ख) ब्राह्मण व उपनिषद--ब्राह्मण साहित्य में एत्तरेय, पंचविश, शतपथ आदि विशेष उल्लेखनीय है | एत्तरेय से प्राचीन राजाओं के राज्याभिषेक की व्यवस्था का, शतपथ से गांधार, कैकय, कुरु, विद्रोह, कौशल राज्यों की व्यवस्था का ज्ञान प्राप्त होता है | उपनिषदों में हमे राजा परीक्षित से राजा बिम्बिसार के काल तक के इतिहास का विषद ज्ञान प्राप्त होता है |

(ग) महाभारत--महाभारत से उत्तर वैदिक काल की राजनीतिक व सामाजिक व्यवस्था का ज्ञान प्राप्त होता है | महाभारत तत्कालीन हिन्दू राज्य व्यवस्था व युद्ध व्यवस्था का विपुल ज्ञान कराते है | राज़्यशास्त्र की विशद एवं विस्तृत व्याख्या करनेवाले शास्त्रों के अंतर्गत कौटिल्य का अर्थशास्त्र और व्यासकृत "महाभारत" का उल्लेखनीय ग्रन्थ है | महाभारत का स्वरूप अर्द्ध-पुराणिक (Semi-legendary) तथा अर्द्ध ऐतिहासिक (Semi-historical) है | महाभारत के अंत में शांति पर्व के अंदर राज्य और सरकार का उल्लेख मिलता है | इससे राज्यशास्त्र की विकास परम्परा पर काफी ज्ञान होता है | महाभारत से राज्य की उत्पत्ति और सरकार के विभिन्न कार्यों का भी काफी ज्ञान होता है | महाभारत में राज्यशास्त्र के अनेक विद्वानों व राजनीतिज्ञों के नामों का भी विवरण प्राप्त होता है | जैसे की विशालक्ष, इंद्र, वृहस्पति, मनु, शुक्र, भारद्वाज गरशिरा, कश्यप, मातरिश्वा, मैश्रवण, कामदेश, शसंबर, कालक, वृक्षीय, उतध्य, वसुलोम और कामन्दक, कीर्तिमान, कर्दम, अतंग, अतिबल, वैन्य, परोधा, कात्य तथा योगाचार्य आदि के राजधर्म से संबंधित अनेक नीति-श्लोकों  का उल्लेख महाभारत में मिलता है | 'शांति पर्व' के अलावा, इस ग्रन्थ में राजधर्म खंड एक अलग अध्याय ही है | 'सभापर्व' में आदर्श प्रशासन की कल्पना की गई है तो 'अविपर्व' अध्याय में शासक में शासक के ऐसे कार्यों के औचित्य को सिद्ध करने का यत्न किया गया है जिन्हे शासक अनुपयुक्त वातावरण में करता है तथा सामान्यता जो राजनीति के सिद्धांतों के प्रतिकूल होते है | वानपर्व में भी इस सन्दर्भ में कुछ दृष्टान्त उल्लेख प्राप्त होते है |
यद्धपि महाभारत की राजशास्त्र विषयक सामग्री अनेकों दंतकथाओं पर आधारित है, पर इस दिशा में यह सामग्री अत्यंत स्थान रखती है | इन दंतकथाओं के आधार पर इस राज्यशास्त्र को सामग्री को निराधार एवं अनुचित नहीं कहा सकता है | महाभारत में इस प्रकार का वर्णन आता है की सर्वप्रथम जनकर्ता ब्रह्मा ने एक लाख श्लोकों के अंदर दंडनीति की रचना की | इस रचना के पश्चात् इंद्र, वृस्पति और मनु ने आगे चलकर इसकी एक संक्षिप्त रूप से प्रदान किया | इस प्रकार से यह यह सिद्ध हो जाता है की प्राचीन भारतीय राज्यशास्त्र पर प्रकाश डालने वाले शास्त्रों में महाभारत का विशेष स्थान है | क्योंकि राजनीति से संबंधित प्रायः सभी तथ्य इसके अंदर समविष्ट है |

(घ) रामायण--रामायण भारत का ही नहीं अपितु विश्व का महानतम महाकाव्य है | साथ ही यह हिन्दुओं के सर्वोच्च जीवन आदर्शों की सुन्दरतम अभिव्यक्ति है | विशेष अर्थ में यह भारत का सर्वोच्च प्रतिनिधि काव्य है |

(ड़) बाल्मीकि ने अपनी रामायण में भारत के सामाजिक, धार्मिक, आध्यात्मिक और आदर्श रूप राजनीति जीवन का वास्तविक चित्रण किया है | वाल्मीकि रामायण में राजनीति वातावरण प्रधान है तथा राम-कथा की माध्यम से इस देश की राजनीति का पूर्ण ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है | रामायण में राजा, अधिकारी वर्ग, सामंत, प्रजा और यहाँ तक की ऋषि-मुनि भी राजनीति के प्रभाव से प्रभावित है | रामायण कालीन राज्यों का संचालन धर्म द्वारा होता था | उस समय धर्म किसी वर्ग विशेष, जाति या सांप्रदायिक तत्व से प्रभावित न होकर सदाचार, आत्मकल्याण तथा लोककल्याण आदि भावनाओं के स्तम्भों पर आधारित था | रामायण में वर्णित यही धर्म राज्य का आधार स्तम्भ होने के कारण आज के युग के लिए मार्गदर्शन के रूप में अवस्थित है | अतः, आदर्श राज्य की स्थापना के लिए रामायण में उल्लेखित राजनीतिक तत्वों के अवलोकन की आवश्यकता महत्त्व को और भी बढ़ा देती है |

रामायण में अनेक स्थलों पर अंग, काशी, कोसल, कैकय, मगध, मत्स्य, मिथिला आदि स्वतंत्र राज्यों के नाम मिलते है | इससे ज्ञात होता है की रामायण कालीन भारत में छोटे-बड़े अनेक जनपद थे | राजा की नियुक्ति में प्रायः सामंत राजाओं की सहमति भी आवश्यक होती थी | रामायण में आदर्श राजा की उपमा, अग्नि, इंद्र, सोम, यह और वरुण से दी गई है | राजा देश का शासन मंत्री-परिषद तथा शासनाधिकारी (तीर्थ) कहे गए है | न्यायधीशों के लिए उत्तरकाण्ड में 'धर्मपालक' शब्द मिलता

है | इसके अलावा भी गुप्तचर व्यवस्था, दुर्ग सेना, युद्ध आदि के संबंध में विस्तृत उल्लेख प्राप्त होता है |

(च) पुराण--महाकाव्यों के पश्चात् भारतीय राज्य व्यवस्था पर 18 पुराणों के प्रकाश डाला गया है | विष्णु-पुराण में मौर्य वंश, मत्स्य पुराण में आंध्र वंश तथा वायु-पुराण में गुप्त वंश आदि का विशद वर्णन किया गया है |
पुराणों में राजनीतिक विचार इधर-उधर अव्यवस्थित रूप में प्राप्त होते है | राजनीतिक दृष्टिकोण से अग्नि-पुराण सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है | अग्नि-पुराण में राजा व शासक के कर्तव्य, अभिषेक, युद्धकला, कर, न्याय व्यवस्था आदि का उल्लेख किया गया है और राजा का प्रधान कर्तव्य जन-कल्याण बताया गया है |

(छ) बौद्ध व जैन ग्रन्थ--बौद्ध धार्मिक ग्रन्थ 'मुक्त पिटक' तथा 'अभिधम्म पिटक में धार्मिक व्यवस्था के साथ-साथ राज्य व्यवस्था का भी वर्णन मिलता है | अनेक जातकों से तत्कालीन राजाओं की निरंकुशता तथा राज्य व्यवस्था का पता चलता है | इनमे राजाओं की नियुक्ति, वंशगत व्यवस्था, न्याय व्यवस्था आदि का भी वर्णन मिलता है |
जैन साहित्य में आचार्य हेमचंद द्वारा रचित 'परिशिष्ट पर्वन, ग्रन्थ में मौर्य काल का विस्तृत वर्णन मिलता है | आदि पुराण में तत्कालीन राजनीतिक व्यवस्था, संस्था तथा विचारों का विशेष उल्लेख है |

(ज) कौटिल्य का अर्थशास्त्र--राजशास्त्र के धुरंधर विद्वान कौटिल्य के "अर्थशास्त्र" का स्थान राजनीतिक ग्रंथों में अत्यंत ऊँचा और विशिष्ट है | इसके अंदर जिन राजनीतिक सिद्धांतों का समादेश है, वे धर्मशास्त्रों के प्रभाव से अछूत रहे है | इसके रचियता कौटिल्य के कथानुसार, "पृथ्वी के लाभ और पालने के प्रयोजन से जो अर्थशास्त्र पहले के आचार्यों के द्वारा लिखे गए थे, उन सबका संग्रह करके तथा उनका सार ग्रहण करते हुए इस ग्रन्थ अर्थशास्त्र की रचना की गई है |" इससे स्पष्ट हो जाता है की कौटिल्य के पूर्व अनेक राजनीतिक विद्वानों ने कई अर्थशास्त्रों की रचना की थी | कौटिल्य ने राजनीति के क्षेत्र में जिन विद्वानों की है वे है-भरद्वाज, विशालकक्ष, पराशर, पिशुन, कोन्यदन्त, बाताव्यथि, बाहुदंति पुत्र, कारण्डक भरद्वाज, कात्यायान, घोटमुख, दीर्घचारायण, पिशुनपित्र और किन्जक |

कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में रजनीति से संबंधित 5 मुख्य सम्प्रदायों का भी उल्लेख किया है | वे संप्रदाय इस प्रकार है-मानव ;, वार्हस्पृशयता:, आसंसा:, पाराशरा: और अभ्भीया : | ये अभी तथ्य यह सिद्ध करते है की प्राचीनकाल में मानव की विचारधारा के विकास के साथ ही इन सम्प्रदायों का भी विकास होता गया |

कौटिल्य के अर्थशास्त्र को राजनीति के क्षेत्र में वही महत्त्व प्रदान किया जाना चाहिए जो की व्याकरण के क्षेत्र में 'अष्टध्यायी' को प्राप्त है | वाचस्पति गैरोला के अनुसार, "पूर्ववर्ती आचार्य परंपरा में सभी विद्वान एवं कृतियों जो इस समय प्राप्त नहीं होती है,  सारांश हमको कौटिल्य के अर्थशास्त्र में प्राप्त होता है जिनके विचारों का समावेश अर्थशास्त्र के अंदर किया गया है | इस आचार्य परंपरा से यह भी सिद्ध हो जाता है की अर्थशास्त्र बहुत पहले से निर्मित होने लगा था | अनेकों अंशों के अंदर उनका आदरपूर्वक उल्लेख भी किया जाने लगा था, इस प्रकार का विवरण हम कौटिल्य के अर्थशास्त्र में पाते है |

कौटिल्य के अर्थशास्त्र का महत्त्व और भी बढ़ जाता है, क्योंकि वे अर्थशास्त्र के लेखक, सर्वोच्च राजनीतिज्ञ, एक साम्रज्य के संस्थापक तथा कुशल शासन विशेषज्ञ होने के साथ-साथ राजनीतिशास्त्र के स्कुल के संस्थापक भी थे |

कौटिल्य ने अपने ग्रन्थ में राजा के कर्मों की विशद व्याख्या की है | राजा के विभिन्न क्षेत्रीय कार्यों तथा उसकी तत्समबन्धी नीति का उल्लेख इस ग्रन्थ में उपलब्ध है | दंडनीति के पालन के विषय में लिखा है की, " यदि राजा कठोर दंड व्यवस्था रखता है तो सभी प्रजा उससे उद्विग्न हो जाती है और इसी प्रकार से यदि वह इस नीति का पालन करने से ढीलापन दिखलाता है तो उसकी शासन व्यवस्था में ढीलापन आ जाता है | इस प्रकार से राजा को एक उचित नीति निर्धारण करके उसको व्यवहार में लाना चाहिए | "

कौटिल्य ने मंत्रियों के महत्त्व का उल्लेख करते हुए लिखा है की जिस प्रकार से एक पहिये की गाड़ी ठीक प्रकार से नहीं चल सकती, उसी प्रकार केवल मात्र राजा के द्वारा शासन को नहीं चलाया जा सकता, इसलिए राजा को चाहिए की वह अपने मंत्रियों के सुझाव का महत्त्वपूर्ण मामलों में आदर अवश्य करें | मंत्रियों की नियुक्ति के विषय में कौटिल्य ने अपने पूर्ववर्ती राजनीतिवेत्ता भारद्वाज के मत का प्रारंभ में वर्णन किया है, जिसके अनुसार, " राजा को चाहिए की वह अपने साथियों को मंत्रिपद पर नियुक्त करें, क्योंकि उनकी हार्दिक पवित्रता से वह भली-भांति परिचित रहता है |" कौटिल्य ने उक्त मत को और भी विशद रूप देते हुए कहा की राजा को चाहिए की वह विद्या, बुद्धि, साहस, गुण, दोष, काल और योग्यता का विचार करते हुए मंत्रियों का निर्वाचन करें, पर उसे इनको भी अपने गोपनीय मामलों का भेद नहीं होना चाहिए |

उपर्युक्त व्याख्या से स्पष्ट हो जाता है की अर्थशास्त्र राजनीति के के व्यावहारिक पहलु पर अधिक प्रकाश डालता है, अपेक्षाकृत उसके सैद्धांतिक पक्ष पर कम | अल्तेकर (Altekar) के अनुसार," अर्थशास्त्र एक शासक के लिए सहायक ग्रन्थ है और न की इसके सैद्धांतिक पक्ष के लिए अर्थात राजनीतिशास्त्र के मूलभूत सिद्धांतों एवं राजनीति के आदर्शों की व्याख्या करने में इसका कार्य एवं मशीनरी का यह वर्णन करता है | चाहे वह शांतिपूर्ण स्थिति हो या अशान्तिपूर्ण इसमें शुक्र नीति का यथासंभव पृथक रखा जाता है |

प्रारम्भ में ही आचार्य कौटिल्य ने यह स्पष्ट किया है की अन्वीक्षिकी, त्रयी, वार्ता और दंडनीति ये वास्तव में चार विधायें इस प्रकार की है इनका यथार्थ होना धर्म और अधर्म पर आधारित है | राजा के कर्त्तव्य का वर्णन करते हुए कौटिल्य ने खा है की धर्म का पालन करने से व्यक्ति को मोक्ष की प्राप्ति होती है और इसी कारण राजा 

का यह पुनीत कर्त्तव्य हो जाता है की वह अपनी प्रजा को धर्म के मार्ग से विचलित न होने दें | वह राजा को उसके कर्त्तव्यों के प्रति सचेत करता है की राजा को सदा प्रजा के हित में रत रहना चाहिए और इसी स्थिति में वह दीर्घायु हो सकता है | अर्थशास्त्र के आगामी प्रकरणों के अंतर्गत राज्य के विद्रोहियों के लिए दंड की व्यवस्था का वर्णन किया गया है | तथा अनेकों अन्य प्रकरण संधि, शत्रुता और अनेक राजनीतिक विषयों का वर्णन करते है | यदि हम राजनीतिक दृष्टिकोण से देखें तो अर्थशास्त्र एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ मालूम पड़ता है | इस विषय में डॉ० बेनी प्रसाद का कथन उल्लेखनीय है | उनके अनुसार, "शासनात्म्क प्रबंध के विषय में अर्थशास्त्र, हिंदी साहित्य की एक कहने को रह गई है | इस प्रकार के सिद्धांतों का निरूपण करना वास्तव में किसी भी सामान्य प्रतिभा के राजनीतिज्ञ द्वारा संपन्न न था |"

(झ) कामन्दकी नीतिसार--वास्तव में यह ग्रन्थ कौटिल्य के ग्रन्थ "अर्थशास्त्र" का एक प्रकार से संक्षेपीकरण कहा जा सकता है | प्रो० अल्तेकर के अनुसार, " कामन्दक नीतिसार कौटिल्य के अर्थशास्त्र का सारांश मात्र है | "इसकी रचना 400-500 ई० के आसपास मानी जाती है | इस ग्रंथि के अंतर्गत राजा के परिवार का विस्तार से विवरण मिलता है | इस काल में आते-जाते गणतंत्रों का उल्लेख नहीं आता है | इस ग्रन्थ का संक्षेपीकरण होने पर भी इसमें गणतंत्रों का उल्लेख नहीं आता है | इस ग्रन्थ की मौलिकता निविर्वाद है और इसके रचियता के रूप में चन्द्रगुप्त द्वितीय के मंत्री स्वामिन को स्वीकार किया जाता है |

कामनन्द ने कौटिल्य के प्रति जो आभार प्रकट किया है, यहाँ पर उल्लेखनीय हो जाता है, क्योंकि इससे यह स्पष्ट हो जाता है की ग्रन्थ अर्थशास्त्र पर आधारित है | कामन्दक नीतिसार में राज्य सिद्धांत, राजा के कर्त्तव्य व अन्य सामाजिक व्यवस्था का वर्णन पाया जाता है |

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